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आखिर किस ताकत के दम पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को आंख दिखाते हैं नितिन गडकरी?

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नई दिल्ली/मोदी सरकार में सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के तेवर आज कल कुछ ज्यादा ही बगावती दिख रहे हैं। उनके एक बयान पर विवाद थमता नहीं है कि उनका दूसरा बयान सामने आ जाता है। हंगामा और फिर से वही सफाई कि मीडिया ने मेरे बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। लेकिन लगातार आते उनके बयान इतेफाक नहीं लगते, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक हमला लगता है। लेकिन ये हमला बार-बार मोदी-शाह की जोड़ी की तरफ ही होता हुआ क्यों दिख रहा है?
तीन राज्यों में हार के बाद भाजपा के अंदरखाने इस बात की चर्चा होनी शुरू हो गई है कि अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को बहुमत से कम सीटें मिलती है, तो समर्थन जुटाने के लिए एक उदार चेहरे की जरूरत पड़ सकती है। नरेन्द्र मोदी के नाम पर ममता बनर्जी और मायावती जैसे नेताओं का समर्थन जुटाना मुश्किल हो जायेगा, इसलिए पार्टी और संघ के एक धड़े में नितिन गडकरी के नाम की चर्चा शुरू हो गई है। नितिन गडकरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं और फिलहाल मोदी सरकार में सड़क परिवहन और जल संसाधन का जिम्मा संभाल रहे हैं। इनकी गिनती सरकार के सबसे बेहतरीन काम करने वाले मंत्रियों में होती है।
नितिन गडकरी की खड़ी-खड़ी
हाल ही में देश के कई मीडिया संस्थानों के समिट में जब इस बात को नितिन गडकरी से पूछा गया तो उन्होंने इसकी संभावनाओं को खारिज कर दिया। हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना बायोडाटा कभी किसी को नहीं दिया है, ना ही वो अपना कटआउट लगाते हैं, ना ही मीडिया में किसी से सहयोग मांगते हैं। उन्होंने आगे कहा कि पार्टी के उनके हैसियत के हिसाब से बहुत ज्यादा दिया है। उन्होंने कहा कि जब वो दिल्ली आये थे तो उनसे एक नेता ने कहा, ”नितिन जी आपको कुर्ता और धोती पहनना चाहिए, अगर आपको कुछ बड़ा प्राप्त करना है। मैंने उनसे कहा कि मैं जो पहनता हूँ, उसी को पहनते रहूंगा, चाहे कुछ मिले या नहीं।”
नितिन गडकरी नागपुर और संघ के लाडले
नितिन गडकरी को दबंग छवि वाला नेता माना जाता है। वोटबैंक की परवाह ना करते हुए अपने काम को लेकर सजग रहना ही उन्हें  इनोवेटिव आईडिया, समय से पहले अपने काम को पूरा करना और राजनीतिक टिका-टिप्पणी से दूर रहना, पिछले कई वर्षों से यही नितिन गडकरी की छवि रही है। नितिन गडकरी अक्सर अपने काम को लेकर मीडिया को चुनौती देते नजर आते हैं। देश में चारों तरफ सड़कों का जाल बिछाना हो या पानी में क्रुज चलाना हो, गंगा की सफाई का जिम्मा हो या पर्यावरण को दूषित होने से बचाने के लिए सड़क निर्माण में प्लास्टिक का इस्तेमाल करना हो, गडकरी हमेशा अपने क्रिएटिविटी के लिए जाने जाते रहे हैं। विरोधी पार्टियों के नेता भी उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं।
सर्वमान्य छवि के कारण ही गडकरी के नाम की चर्चा प्रधानमंत्री पद के लिए की जा रही है। संघ से भी नितिन गडकरी की नजदीकियां रही हैं। गडकरी नागपुर से ही लोकसभा के सांसद हैं और संघ का मुख्यालय भी नागपुर में है। मोहन भागवत और नितिन गडकरी के बीच भी अच्छे सम्बन्ध बताये जाते हैं। अपने इन्हीं संबंधों के दम पर नितिन गडकरी 2009 में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। लेकिन 2013 में अपने ऊपर भ्रष्टाचार के लगे आरोपों के कारण उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। बाद में उनके ऊपर जो आरोप यूपीए सरकार ने लगाया था वो सब फर्जी साबित हुए। बताया जाता है कि दिल्ली में बीजेपी के ही कई नेता उनके अध्यक्ष बनने से खुश नहीं थे।
नरेन्द्र मोदी के संकटमोचक ‘गडकरी’
गंगा की सफाई में जब उमा भारती सफल नहीं हो पायी, तो नरेन्द्र मोदी ने अपने संकटमोचक मंत्री नितिन गडकरी को याद किया। नितिन गडकरी ने इस मंत्रालय को संभालने के बाद कई प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया था। गडकरी के मुताबिक 2019 के मार्च तक 70 फीसदी गंगा निर्मल हो जाएगी। नरेन्द्र मोदी अक्सर गडकरी को बुलाकर अपनी कई योजनाओं पर उनसे चर्चा करते हैं। गडकरी भी प्रधानमंत्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व की तारीफ करते हैं। ऐसे में इन चर्चाओं का गर्म होना नितिन गडकरी के राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के आसमान पर पहुंचने के संकेत दे रहे हैं। उन्होंने पिछले दिनों विजय माल्या का बचाव किया था, जिसे कॉर्पोरेट वर्ल्ड के समर्थन जुटाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा था।
नितिन गडकरी ने कई मौकों पर मीडिया में चल रहे इन अफवाहों को खारिज किया है। और उन्होंने इस बात का भरोसा दिलाया है कि वो एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में सड़क एवं परिवहन मंत्री बनना चाहते हैं। उन्होंने हाल ही में कहा था कि नरेन्द्र मोदी ने उन्हें कई मौकों पर बुलाकर अहम मंत्रालय लेने का ऑफर दिया है, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया है। क्योंकि सड़क-परिवहन मंत्रालय उनमें रोचकता पैदा करता है। ऐसे नेताओं की राजनीतिक मंशा का सटीक अंदाजा कोई नहीं लगा सकता।
आखिर इन चर्चाओं के मीडिया में आने के पीछे कुछ तो कारण जरूर रहा होगा। लेकिन अगर पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं होने की स्थिति में गडकरी का नाम लिया जा रहा है तो फिर ऐसे में राजनाथ सिंह और अरुण जेटली क्या चूप बैठेंगे। क्योंकि ये दोनों नेता नरेन्द्र मोदी के बहुत लाडले हैं।