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नीतीश कुमार दिल्ली का बदला पटना में ले रहे हैं?: नज़रिया

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बिहार की सत्ता-राजनीति में अपनी साझीदार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) ने फिर से अपने पुराने तल्ख़ तेवर दिखाने शुरू कर दिये हैं.

केंद्र में इस बार मोदी मंत्रिपरिषद के शपथ ग्रहण से लेकर बिहार में नीतीश मंत्रिमंडल के विस्तार तक गुज़रे चार दिनों में दोनों दलों की अनबन साफ़-साफ़ दिखी है.

जेडीयू के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी सरकार के गठन में अपने दल के साथ हुई कथित बेइंसाफ़ी का खुलकर इज़हार कर ही दिया है.

इसबार दिल्ली से पटना लौटते ही उन्होंने आनन फ़ानन में राज्य मंत्रिमंडल का विस्तार करके सबको चौंका दिया. ख़ासकर बीजेपी के लिए था यह झटका.

इसे केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जेडीयू को जगह नहीं मिलने की प्रतिक्रिया से जोड़ कर देखने वाले यह पूछने भी लगे हैं कि क्या दिल्ली का बदला पटना में लिया जा रहा है?

लोगों की इस धारणा को तब और बल मिला, जब पता चला कि सिर्फ़ जेडीयू के विधायकों को इस मंत्रिमंडल-विस्तार में शामिल किया जा रहा है.

जेडीयू के खाली पद

बीजेपी की तरफ़ से आधिकारिक तौर पर फ़ौरन कोई स्पष्टीकरण नहीं आने और इस प्रकरण में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेताओं द्वारा नीतीश कुमार के पक्ष में बयानबाज़ी शुरू हो जाने से बिहार का एक अलग ही सियासी रंग दिखने लगा.

नौबत जब यहाँ तक आ गयी, तो नीतीश कुमार ने ट्वीट के ज़रिये और बीजेपी-जेडीयू के कुछ नेताओं ने बयान दे कर स्पष्ट किया कि जेडीयू कोटे के जो मंत्री-पद ख़ाली थे, सिर्फ़ उन्हें भरा जा रहा है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजेपी नेता सुशील मोदी ने सफ़ाई दी कि बीजेपी कोटे से जो मंत्री-पद के लिए एक या दो रिक्तियाँ हैं, उन्हें बाद में भरने पर सहमति बन चुकी है.

मतलब दोनों दलों के बीच पैदा हुई अंदरूनी खटास पर मिठास का लेप चढ़ाने की कोशिश होने लगी. लेकिन इस कोशिश का भी रंग फीका ही नज़र आ रहा था, क्योंकि विगत चार दिनों में दोनों दलों के ‘एक्शन और रिएक्शन’ को लोग प्रत्यक्ष देख चुके थे.

विधानसभा चुनाव की तैयारी?

लग यही रहा है कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र ये दोनों दल अपने इरादों के अनुकूल रणनीति बनाने और ज़रूरत के अनुसार पैंतरा बदलने की भूमिका अभी से बाँधने लगे हैं.

मेरे ख़याल से यह ‘सांकेतिक भागीदारी’ वाला नुस्ख़ा नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने नीतीश कुमार की संभावित प्रतिकूल प्रतिक्रिया को भाँप कर ही आज़माया होगा.

ऐसे में संदेह पनपना स्वाभाविक है कि मोदी सरकार अब नीतीश को कहीं अपने उद्देश्य में अवरोधक मानते हुए धीरे-धीरे किनारे खिसकाना तो नहीं चाह रही है !

क्योंकि ज़ाहिर था कि नीतीश सिर्फ़ अपने अति निकटस्थ और स्वजातीय सांसद आरसीपी सिंह को केंद्र सरकार में मंत्री बनवा कर अपने दल के भीतर ही विवाद में नहीं फँसते.

दूसरी बात कि राम मंदिर या धारा 370 जैसे मुद्दों पर बीजेपी से बिलकुल अलग रुख़ अपनाते आ रहे जेडीयू- नेतृत्व को मोदी सरकार में शामिल हो कर इस बाबत विरोधी तेवर क़ायम रख पाना मुमकिन नहीं लगा.

ऐसा भी हो सकता है कि विकराल हो चुकी बीजेपी के आगे अपना सियासी वक़त (वज़न) घटते जाने के ख़ौफ़ में नीतीश हाथ-पैर मारने लगे हों.

यहाँ ग़ौरतलब ये भी है कि नरेंद्र मोदी के प्रति हिंदू-रुझान और राष्ट्रवाद वाली लहर का चुनावी फ़ायदा उठाने के लिए जेडीयू ने इसबार अपना चुनावी घोषणा पत्र भी जारी नहीं किया.

अगर जेडीयू इन विवादास्पद मुद्दों पर अपने निश्चय के स्पष्ट उल्लेख वाला चुनाव घोषणा पत्र जारी करता, तो इसका उसे नुक़सान उठाना पड़ सकता था.

अब चूँकि केंद्रीय सत्ता में मनोनुकूल हिस्सेदारी से नीतीश कुमार को बीजेपी ने ही वंचित कर दिया है, इसलिए बिहार की सत्ता पर अपनी मज़बूती बढ़ाने में वह जुट गए हैं.

नए मंत्रिमंडल विस्तार में जातिगत समीकरण

राज्य मंत्रिमंडल के मौजूदा विस्तार में पिछड़े, अति पिछड़े और दलित समुदाय से छह विधायकों को मंत्री बनाने और सवर्ण समाज के सिर्फ़ दो विधायकों को मंत्री पद देने का मक़सद समझा जा सकता है.

बीजेपी और जेडीयू के बीच अनबन के जो ताज़ा संकेत उभरे हैं, उन्हें दबा-छिपा कर रख पाना दोनों के लिए कठिन होता जा रहा है.

ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों एक दूसरे की भावी सियासी चाल को लेकर सशंकित नज़र आने लगे हैं.

नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दलों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं दिए जाने पर खुल कर सवाल उठाए हैं.

उन्होंने बीजेपी नीत केंद्र सरकार में सहयोगी दलों की ‘सांकेतिक भागीदारी’ वाली नीति को आड़े हाथों लिया है.

जेडीयू नेताओं ने यहाँ तक कह दिया है कि सहयोगी दलों के प्रति वाजपेयी सरकार का रवैया और नज़रिया बेहतर था.

ज़ाहिर है कि यहाँ नीतीश ख़ेमा मोदी शासनकाल की प्रचंड बहुमत वाली बीजेपी और वाजपेयी सरकार में सहयोगी दलों पर आश्रित बीजेपी के बीच का बड़ा फ़र्क़ नहीं दिखाना चाहता है.

उधर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व जेडीयू के इस रवैये पर ‘इग्नोर या डोंट केयर’ जैसी मुद्रा अख़्तियार किए हुए है.

यहीं लगता है कि नीतीश के प्रति मोदी और शाह का रुख़ अब पहले की तरह पटाकर रखने जैसा नहीं रहने वाला.

उधर नीतीश भी कम चतुर नहीं हैं. इस बदलाव को भाँप कर ही उन्होंने कई तीर छोड़ दिए हैं.

केंद्र सरकार में बिहार से बनाये गए मंत्रियों में अगड़ी जातियों को तरजीह और पिछड़े-दलित समाज की उपेक्षा संबंधी आरोप लगाने वालों में जेडीयू भी शामिल हो गया है.

हद तो ये है कि गत लोकसभा चुनाव में शून्य पर आउट हुआ राष्ट्रीय जनता दल फिर से जेडीयू के साथ महागठबंधन की संभावना टटोलने लगा है.